Banaras
Khoj
Gandi Naali Ke Keede
Baatein
Khuda
Mulakat
भटकता है जिया, कहीॅ उन गलियोॅ मे
सफेद हो चुके पत्थर लगेॅ हैॅ जहाॅ
और उन ऊचे तनेॅ पेड़ो की डालोॅ पर
वो बैठ कर वो सुस्ताता है
ये दिल थका-थका सा महसूस करता है
जवानी के इन खूबसुरत लम्होॅ मे भी
बस गये होॅ जैसे बिछड़्ने के सदमेॅ
इसके जेहन मे कहीॅ
और आॅखेॅ भरी रहतीॅ हैॅ, हर पल यूॅ
जैसे छलकते जाम हैॅ, कईयो जमा वहॉ
वक्त है, यू कट जाता है, पता नही
ले जायेगा हमे ये कहॉ
दिल यूॅ सैर कर, फिर कर, आखिर मे
रोता है, अकेला पाकर कहीॅ चुपचाप
ए बनारस, तेरी खुशबू के बिना
मै चैन पाऊॅगा कहॉ ।
- प्रद्युम्न
शरीर- भूख है, दर्द है।
खुशियॉ पल भर की
और साथ मेॅ- भय, पाप, छोभ
शान्त हूॅ, मैॅ खोज मे हूॅ, निरन्तर
उस सॅसार की
जहाॅ खुशियॉ ना होॅ
मात्र दुखोॅ का विलोप
जहॉ हल्का हो सके
जिन्दगी का शोक
- प्रद्युम्न
जितना डरा, उतना डराया गया
निशाना बनाया गया
जिन्दगी की सच्चाइयोॅ से बस वो ही रुबरु हुआ
उसको गन्दी नाली मे बढाया गया
उसनेॅ अपनी कीमत नहीॅ समझी
उसको वही पढाया गया
काला, कमजोर, कमीना
कुत्तो सा पला, लड़ाया गया
अब जिसकी विचारधाराओॅ को ही
इस तरह निखारा गया
उन गन्दी नाली मे पलनेॅ वालो से हम
नफ़रत कर सकते हैॅ
जेलोॅ मे भर सकतेॅ हैॅ
पर उनको गाॅधी बननेॅ पर मजबूर नहीॅ कर सकते
- प्रद्युम्न
उसने आँखों से की बाँते
वो चिल्ला कर चली गयी
और मेरी आवाजें
चुप सी खड़ी रहीं ।
- प्रद्युम्न
उन्ही जालों में फ़सा,
जिन्हे मैनें बुना था;
जिसे मै दुनिया समझा,
वो मेरा अपना बनाया वहम था;
अब तो बस अपनी खोज बाकी रह गयी है;
मैने कहीं खुद ही सुना,
जो मैने बोला था;
और फिर साफ़ करके,
मेरी अपनी फ़ैलायी हुयी धुन्ध,
मैने देखा मैं खुद को घूर रहा था;
खुद से दूर करके अपने को,
मै खुद के पास आता हूं,
अन्त तैयार करता हूं,
फिर सुरूवात बनाता हूं;
मै ही खुदा था, मै ही खूदा हूं,
खुद को तलाशता हूं:
- प्रद्युम्न
अंजानी राहॊं मॆं,
जानने चला है,
परखने चला है,
अपनेपन को
क्या है इसका महत्व
मायूसी, अकेलेपन मे
तपती सड़क पर
क्या आज मिलेगी
उसे जिन्दगी
अन्तर्मन की आवाजों को
बाहर लाने पर तुला है
सुनने पर तुला है
जो आत्मा चीखती है
और जब मुलाकात होती है
तलाश पूरी होती है
खुले जहां के नीचे
खाली होता है
सालों से भरा मन ।
- प्रद्युम्न
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